शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

नये साल में नया सबेरा आएगा

नये साल में नया सबेरा आएगा,
अंधियारा मिट जाएगा जीवन का, तन-मन हर्षाएगा
यही बात हर बार सोचकर राही कदम बढ़ाता जा
तपता-जलता फिर भी मंजिल तक इठलाता जा
महंगाई के बोझ से दबकर बार-बार पछताना है
राजनीति का खेल है भइया  उनको सबक सिखाना है
बावजूद इसके हम सबको जीवन की नाव चलाना है
बहुत कठिन है डगर यह यारो फिर भी चलते जाना है
धनवानों का शगल बन चुका जश्‍न का मौका उन्‍हें तो नीर बहाना है
ऐसे में नूतन वर्ष का कैसे हो अभिराम
देश हमारा भारत है, इसके लोग महान
हिंदू-मुस्लिम, सिख, इसाई सारे भाई-भाई हैं
समरसता की बात करो तुम, रंज की पाटो खाईं
तभी देश की होगी तरक्‍की, आएगी खुशहाली
आओ हम सब मिलकर यारों भविष्‍य की राह संवारे
नये वर्ष में कम से कम एक संकल्‍प अपना लो
नशामुक्‍त हो जीवन अपना खुशियों से भर डालो
शिक्षा का ज्ञान फैलाकर भटके को राह दिखाओ
आतंकवाद, धर्मवाद और रिश्‍वतखोरी को तजकर
सत्‍य अहिंसा की राहों पर चलकर बोले हर इंसान
अपना भारत देश महान, अपना भारत देश महान
मंगलमय हो नव वर्ष सभी को अमंगल की पड़े न छाया
चारों ओर सुख-समृद्धि हो, स्‍वस्‍थ्‍य-निरोगी हो काया।

बुधवार, अगस्त 04, 2010

गांव हो तों भूमती जैसा

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित भूमती गांव पहुंचने पर असल गांव की सुन्‍दर तस्‍वीर दिखी। पहाड़ों के बीच बसे इस गांव में कुल छह सौ की आबादी है। यहां से थाना सोलह किलोमीटर की दूरी पर है जबकि हायर सेकेण्‍डरी स्‍कूल व प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र गांव में ही है। हम इस गांव में अपने एक मित्र के रिश्‍तेदार के साथ पहुंचे। वक्‍त करीब साढ़े आठ बजे का। गांव के बीच से होकर गुजर रहे मुख्‍य मार्ग पर इक्‍का-दुक्‍का वाहनों की आमदरफ़त जारी थी। बाईं ओर स्थित बिटटू कांसटक्‍शन के कार्यालय पर आधा दर्जन युवकों की मौजूदगी रही। कार्यालय में पहुंचते ही सबके चेहरे खिल उठे। शहर में रहने वाला उनका भाई-रिश्‍तेदार जो आया था। कार्यालय में मौजूद सभी युवकों ने हाथ मिलाये और गले मिलकर स्‍वागत किया। संयोग की बात थी कि उसी दिन मित्र के रिश्‍तेदार के चचेरे भाई की शादी थी। इस कारण हम लोगों को शादी की रस्‍म देखने का मौका मिला। करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर जब हम वहां तक पहुंचे तो रंग-बिरंगी रोशनी से मकान जगमगा रहा था। महिलाएं, बच्‍चे बूढ़े हर कोई खुशी से सराबोर था। हम लोगों के साथ रहे गांव के युवाओं ने पद के हिसाब से सबके पांव छुए व गले मिलकर खुशियां जताईं। बगल ही कच्‍चे चूल्‍हे पर भोजन पक रहा था। हम लोगों के पहुंचने तक अधिकांश लोग भोजन कर वापस लौट चुके थे। करीब आधा घंटे बाद भोजन का नम्‍बर आया। छोटे से खेत में बिछी टाटपटटी पर
पर हम लोग बैठे तो पत्‍तल मिलने के साथ ही खाना भी परोसा जाने लगा। करीब दर्जन भर लोगों को खाना परोसने का कार्य एक ही व्‍यक्ति कर रहा था शायद वह ही गांव का खानशामा था। पहले चावल फिर सब्‍जी, फिर कढी और दाल तथा सब्‍जी के साथ ही मीठी बुदियां भी थीं। सबसे अहम बात तो यह थी कि रोटी का जुगाड नहीं था। पूछने पर पता चला कि समारोहों में यहां इसी तरीके की व्‍यवस्‍था रहती है। चावल के साथ विभिन्‍न तरह की दालें व सब्जियां परोसी जाती हैं। भोजन के बाद नम्‍बर आया विश्राम का। इसके लिए हम लोगों को करीब पांच सौ मीटर दूर बिटटू भाई के घर जाना पड़ा। करीब तीस लाख रुपये की लागत से उन्‍होंने सिर्फ मकान नहीं बनाया था बल्कि अपने सपने को सच किया था। हवा, पानी स्‍वच्‍छता और रसोई सब कुछ बिल्‍कुल करीने से। रात में बातचीत के दौरान बिटटू भाई ने बताया कि उनके गांव में शादी हो या मरण, हर छोटा बड़ा शामिल होता है जिसकी जो डयूटी लगती है उसे पूरी करनी पड़ती है। उन्‍होंने बताया कि सबसे कष्‍टकारक क्षण अंतिम संस्‍कार के होते हैं कारण अर्थी सिर्फ दो कंधों पर ही श्‍मशान घाट को जाती है। ऐसा इसलिए कि पहाड़ों पर चार लोगों के चलने की व्‍यवस्‍था नहीं रहती। अंतिम संस्‍कार के लिए हर कोई हाथ में लकडि़यां लेकर जाता है। वे बोले कि यहां क्राइम नाम की कोई चीज नहीं है। आपसी भाईचारा इस कदर कायम है कि घर से निकलने के बाद हर कोई अपने बडों का पांव छूकर आशीर्वाद लेता है। गांव में ही जरूरत के सारे सामान मिल जाते हैं इसलिए बाजारों तक दौड़ लगाने से फुर्सत रहती है। शांति और सौहार्द कि मिशाल है भूमती गांव यदि यूपी भी ऐसे गांव हो जायं तो शायद खुशहाली और समृद्धि कई गुना बढ़ जायेगी- सैर जारी

रविवार, जून 20, 2010

बाढै़ पुत्र पिता के धरमे, खेती उपजे अपने करमें

हमारे यहां अवधी में कहावत है बाढैं पुत्र पिता के धरमे, खेती उपजे अपने करमें अर्थात पुत्र का विकास उसी तरह होगा जिस तरह पिता ने अपने पितृ धर्म को निर्वहन किया होगा। यदि पिता संस्‍कारवान है, शिक्षित है और समाज में उसकी अच्‍छी छवि है तो बेटा उनकी ख्‍याति को आगे बढा़ने की कोशिश करेगा। कहते हैं कि मां बच्‍चों की प्राथमिक पाठशाला होती है और पिता से अच्‍छा गुरु नहीं हो सकता है। यदि अपने बच्‍चों के भविष्‍य के प्रति पिता जागरूक है तो वह निश्चित की सफलता की बुलंदियों को छुयेगा। यदि पिता दुर्गुण युक्‍त होगा तो (अपवाद मात्र छोड़कर) उनके बच्‍चे भी गलत सोहबत में पड़कर बर्बाद हो जायेंगे। ऐसे में फादर्स डे की कल्‍पना बेमानी होगी। वह भी तब जब यह विशेष दिवस रूपी पिता सौ साल बूढा हो गया है। हम गांव के रहने वाले हैं। गांवों में अभी भी पढ़े लिखे लोगों की कमी है। इस कारण जो संस्‍कारविहीन परिवार हैं उनमें पारिवारिक झगड़े अक्‍सर होते रहते हैं। किसी को अपने बेटे से गिला है तो कोई अपनी दुर्दशा के लिए पिता को कोसता है। इतना ही नहीं सम्‍पत्ति को लेकर पिता-पुत्र के बीच मारपीट और खुरेंजी घटनाएं भी हो जाती हैं। समाचार पत्रों में अक्‍सर यह खबरें आती हैं कि पुत्र ने पिता की हत्‍या कर दी या हमला कर हाथ-पैर तोड़ दिया। कितने बुजुर्ग बाप ऐसे हैं जिन्‍हें बुढ़ापे में दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही है। उन्‍होंने जिस लाडले के लिए ताउम्र खून-पसीना बहाया उन्‍होंने ही तिरस्‍क2त कर दिया है। ऐसा ही एक वाक्‍या सेवानिवृत्‍त अभियंता के साथ हुआ। उन्‍होंने बेटे की कारगुजारी से आजिज आकर उसे बेदखल करने के लिए इस्‍तहार छपवाया। अखबार में यहसूचना देख उनका बेटा आग-बबूला हो गया। उसने उनकी इस कदर पिटाई की कि वह दूसरे दिन अखबार के दफ़तर पहुंचे तो रूंधे गले से आवाज नही निकल रही थी। डरे-सहमे उन्‍होंने दूसरे दिन अपने की इस्‍तहार का खण्‍डन छपवाया तब जाकर जान बची। यह कहना गलत होगा कि हर बाप या बेटे में कमी है लेकिन ऐसे लोगों की तादाद अब बहुतायत हो चली है जिन्‍हे न अपने बेटे की चिंता है और न बेटे को बाप की फिक्र। पढ़े-लिखे लोगों के बीच इनकी सख्‍या कम है लेकिन अशिक्षित व कम पढ़े-लिखे लोगों के बीच यह बीमारी लाइलाज होती जा रही है। आज जरूरत है इससे लड़ने कि न कि सिर्फ किसी विशेष दिवस मनाने की। इसकी मुहिम विद्या के मंदिरों से प्रभावी ढंग से शुरू हो सकती है।

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

...हम लोग रोजाना मूर्ख बन रहे

सुबह-सुबह हमारे ग्रामीण सहयोगी का फोन आया। मोबाइल की स्‍क्रीन पर उनका नाम दिखते ही लगा कुछ अनहोनी जरूर हुई। इसी आशंका के साथ फोन रिसीव किया तो ग्रामीण रिपोर्टर ने बताया कि अमुख जगह एक्‍सीडेंट हो गया है चार-पांच लोगों के मरने की खबर है। इसी सि‍लसिले में मैं मौके तक जा रहा हूं। उनका फोन कटनें के बाद मेरे मन में यह सवाल उपजा कि कहीं किसी ने हमारे सहयोगी को अप्रैलफूल तो नहीं बना दिया ? करीब 15 मिनट बाद फिर फोन आया तो रिपोटर्र गुस्‍साया हुआ था उसने बोला कि भाई साहब किसी ने मजाक कर दिया। वहीं हमारे पड़ोस में रहने वाली पूजा से किसी ने कहा कि उसके घर मेहमान आये हैं वह बाहर दरवाजे की ओर दौड़ी तो वहां कोई नहीं था। इतना ही नहीं हम लोगों के फोन पर यह संदेश आने लगे कि प़ुलिस पकड़ गई। इस मैसेज को जिसने ध्‍यान से नहीं पढ़ा वह सरपट उस दिशा की ओर लपका जहां का वाक्‍या बताया गया था। हद तो तब हो गई जब डाग साहब के मरने और डीओजी साहब के दौरे जैसे शब्‍दों का जाल बनाकर लोगों को मूर्ख बनाया गया। जो शब्‍दों पर गौर नहीं कर सका वह सचमुच में किसी डाक्‍टर के मरने की दशा में दुख जताने से गुरेज नहीं किया। दिन भर ऐसे ही संदेशों, सूचनाओं और अफवाहों का बाजार गर्म रहा। इससे काफी लोग परेशान हुए तो कइयों के लिए मजाक मनोरंजन साबित हुआ। अब सवाल उठता है कि हम ऐसा क्‍यों और किसके लिए करते हैं क्‍या सभ्‍य समाज के लोगों को मूर्ख बनाने के लिए एक अप्रैल जैसे खास दिन का इंतजार रहता है वास्‍तव में हम लोग रोजाना मूर्ख बन रहे हैं कभी नेताओं के कोरे भाषण में फंसकर तो कभी निजस्‍वार्थ के फेर में। मालिक नौकर को मूर्ख बना रहा तो कहीं मातहत अधिकारियों को टोपी पहना रहे हैं। इसलिए हमें मूर्ख दिवस मनाने के बजाय आये दिन अप्रैलफूल बनने जैसे वाक्‍यों से बचने की कोशिश करनी चाहिए इसके लिए हर पल अधिकारों और कर्तव्‍यों के प्रति सजग रहने की जरूरत है। मूर्ख दिवस के संदर्भ में एक और प्रसंग याद आता है। हम लोगों के बचपन में महीने-दो महीने के भीतर गांव में किसी न किसी के घर यह संदेश आता था कि उनका प्रिय रिश्‍तेदार मर गया। वह रिश्‍तेदार मामा, फूफा, नाना, चाचा, दामाद आदि हो सकता था। यह अशुभ संदेश मिलने के बाद परिवार में रोना-पिटना मच जाता था। यहां यह भी बताना समीचीन होगा कि तब फोन का इतना प्रचलन नहीं था इसलिए संदेश लेकर कोई प्रजा नाई-कहांर आता था। कुछ देर तक महौल शोकमय हो जाने के बाद संदेश वाहक यह बताता था कि अब चुप हो जाइये कोई मरा नहीं बल्कि कौव्‍वा बैठ गया था। कौव्‍वा बैठने का अर्थ उस समय लगाया जाता था कि परिवार में कोई अनहोनी होनी वाली है जिससे बचने के लिए किसी के मृत होने की सूचना भेजी जाती थी। ऐसा लोग मानते थे कि शोक संदेश रिश्‍तेदारियों में जाने से यह विपदा टल जायेगी। अब वह दौर तो लगभग खत्‍म हो गया जिसकी जगह मूर्ख दिवस ने ले ली

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

अयोध्‍या में बोले कागा हो रामनवमी के दिनवा

गोस्‍वामी तुलासी दास जी ने लिखा है- मध्‍य दिवस अरु शीत न घामा पावन काल लोक विश्रामा अर्थात मध्‍यान्‍ह काल है न अधिक शीत है और न अधिक धूप हर दृष्टि से पवित्र समय है और लोक को विश्रांत करने वाला है ऐसे पावन काल में प्रभु श्रीरामचन्‍द्र जी का प्राकटयोत्‍व होता है। हर  साल चैत्र मास शुक्‍ल पक्ष नवमी तिथि पर अपरान्‍ह बारह बजे यह उत्‍सव मनाया जाता है। आदि काल से ही अयोध्‍या के इर्द-गिर्द बड़े क्षेत्र में यह लोक पर्व के रूप में प्रतिष्ठित है। रामनगरी में इस अवसर  पर लाखों लाख  श्रद्धालु अयोध्‍या आते हैं। पावन सलिला सरयू में डुबकी लगाते हैं रामलला के विवादित गर्भगृह सहित मंदिर-मंदिर मत्‍था टेकते हैं। जहां नौ दिनों पूर्व से ही मंदिरों के प्रांगण में प्रत्‍येक शाम बधाई गान की महफिल सजती है वहीं ऐन पर्व पर मंदिरों के गर्भगृह में रामप्राकटय का विशेष अनुष्‍ठान होता है। रामजन्‍मभूमि के अलावा कनक भवन मंदिर में इस दिन विशेष आयोजन होता है।  इस दौरान श्रद्धालु मंदिरों में विराजमान भगवान राम के विग्रह का दर्शन करने के लिए आतुर रहते हैं। श्रीराम चन्‍द्र जी के जन्‍मोत्‍सव में शमिल होने के लिए देश के कोने-कोने और विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। वे जब अयोध्‍या में प्रवेश करते हैं तो सिर पर गठरी और मुख में रामभक्ति का भाव आस्‍था के सागर में हिलारों लेता नजर आता हैं। महिलाएं रामजन्‍म की बधाई गीत गाते हुए अयोध्‍या में प्रवेश करती हैं। वहीं जन्‍मोत्‍सव के दिन वे यह गीत गाना सौभाग्‍य की बात समझती हैं-अयोध्‍या में बोले कागा हो रामनवमी के दिनवा यह गीत इसलिए गाया जाता है कि जब घर में किसी नये मेहमान के पर्दापण का संकेत मिलता है तो कौव्‍वा उस घर की मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करता है। हमें याद है कि बचपन में हम लोग चैत्र रामनवमी के दिन परिवारीजनों और गांव वालों के साथ अयोध्‍या आते थे। सरयू स्‍नान के बाद मंदिरों में दर्शन-पूजन और फिर कढाही चढाने की परम्‍परा भी होती थी। इसके बाद फिर घरों को वापसी होती थी। दो दशक पूर्व बड़ी संख्‍या में श्रद्धालुओं का रेला पैदल ही आता था। नौ दिनों तक चलने वाले उत्‍सव के दौरान अयोध्‍या में उसकी उपस्थिती होती थी। अब जबकि साधनों और संसाधनों का दौर है ऐसे में श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है। कई दिनों तक यहां ठहरने के बजाय अधिकांश  लोग अष्‍टमी की संध्‍या तक पहुंच जाते हैं और श्रीराम चन्‍द्र जी के प्राकटयोत्‍सव के बाद मंदिरों में मत्‍था टेक वापस लौट जाते हैं। किंवदंती है कि श्रीराम जन्‍मोत्‍सव पर उनके बाल स्‍वरूप का दर्शन करने देवता भी अयोध्‍या आते हैं। इस दौरान अयोध्‍या में एक पल भी रहना हजारों तीर्थों व असंख्‍य पुण्‍य के बराबर है।

बुधवार, मार्च 17, 2010

जब रात बारह बजे महिलाओं ने किया श्रृंगार

कहने को हम इक्‍कीसवीं सदी में हैं जहां ज्ञान और विज्ञान के जरिये चांद-तारों के बीच आसियां बसाने की सोच रहे हैं। घर में बैठे देश-विदेश के हर पहलू से वाकिफ हो रहे हैं। यहां तक कि विज्ञान के चमत्‍कार से पुरुष भी बच्‍चे को जन्‍म देने लगा है लेकिन इसके बावजद हम अभी भी कितने पीछे हैं इसकी कल्‍पना करने की शायद जरूरत नहीं समझते। इस देश में कभी मूर्तियों को दूध पिलाने के लिए होड़ लग जाती है तो कभी फल, सब्जियों और पेड़ पौधों में देव आकृति उभरने के कारण उसकी पूजा-अर्चना शुरू हो जाती है। हमें याद है करीब दो दशक पूर्व गांवों में बोगस चिटिठयां और पोस्‍टकार्ड भेजने का दौर चलता था। गांव में किसी व्‍यक्ति के घर पोस्‍टकार्ड आता था जिसमें संतोषी माता के बारे में कई तरह की किंवदंतियां लिखी होती थी। साथ ही यह लिखा होता था कि अमुक स्‍थान पर एक कन्‍या ने जन्‍म लिखा है जन्‍म लेते ही वह उठ बैठी। वह स्‍वंय को संतोषी माता का अवतार बता रही है। उसने कहा है कि जो संतोषी माता का व्रत और उदापन करेगा उसे मनोवांछित फल मिलेगा। पोस्‍टकार्ड के अंत में यह लिखा होता था कि जो भी व्‍यक्ति इस पत्र को पढे़गा उसे 11, 21, 51 या 101 पोस्‍टकार्ड पर यही संदेश लिखकर भेजने होंगे। अगर ऐसा नहीं किया तो उसके परिवार में उसका जो सबसे प्रिय होगा वह मर जायेगा। गांवों में तब उतने पढ़े लिखे लोग नहीं होते थे उन्‍हें अपनी चिटिठयां पढ़वाने व लिखवाने के लिए साक्षरों की बेगार भी करनी पड़ती थी। ऐसी दशा में संतोषी माता का पोस्‍टकार्ड जिसके घर पहुंच जाता था उसकी क्‍या दशा होती होगी इसका सहज ही आंकलन किया जा सकता है। बीस साल में काफी कुछ बदल गया। तख्‍ती से स्‍लेट और अब कम्‍प्‍यूटर तक की शिक्षा ग्रहण करने का दौर नर्सरी से ही चल रहा है इसके बावजूद आडम्‍बर, अफवाहों और अंध विश्‍वासों का दौर नहीं खत्‍म हो सका। यह हालात तब हैं जब सर्व शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों के जरिये समाज के निचले और गरीब तबके के भी लोगों को शिक्षित किया जा रहा है। ऐसा ही एक ताजा वाक्‍या बीत15 मार्च की रात का है जो इन दिनों गांव-गांव और शहर की गलियों में चर्चा का विषय बन गया है-
रात बारह बजे महिलाओं ने किया श्रृंगार
रात करीब दस बजे का वक्‍त था जब सीमा के मोबाइल की घंटी बजी। उसने फोन उठाया तो दूरभाष पर उनकी ननद मुखातिब थीं। वे बोलीं एक खबर है जिसके बारे में बताना है। सीमा यह बात सुनकर उछल पड़ीं कि शायद कोई खुश खबरी मिलने वाली है। वे बहुत आतुर हुईं तो उनकी ननद ने बताया कि किसी स्‍थान पर एक कन्‍या ने जन्‍म लिया है उसने पैदा होते ही कहा कि सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु के लिए पांव में महावर और मांग में मोटिया सिंदूर लगाएं। यह बताने के बाद उस कन्‍या की मौत हो गई। केवल सीमा ही अकेली सुहागिन नहीं हैं जिनके पास इस बाबत फोन आया। यह संदेश पहले दर्जनों फिर सैंकडों और फिर अनगिनत महिलाओं तक पहुंचा। जैसे-जैसे यह संदेह पहुंचता गया वैसे-वैसे अंध विश्‍वास की डोर मजबूत होती गई। इस ताजे वाक्‍ये ने हमारे में समाज में व्‍याप्‍त अंध विश्‍वास की कलई एक बार फिर खोल दी है।

रविवार, मार्च 14, 2010

वही आस्‍तीन का सांप...

तालीम लेने के लिए मां-बाप ने अच्‍छे स्‍कूलों में दाखिला कराया लेकिन गलत सोहबत म पड़ कर रोहित, रानू और मुस्‍ताक वाहन चोरों के गिरोह में शामिल हो गये। वहीं मोनू, सोभित और इसरार जैसे किशोरवय छात्र जो अभी तक टीन एजर हैं उन्‍होंने पहले परिवार के सदस्‍यों की जेब में हाथ मारना शुरू कर दिया। यह सिलसिला बढता गया तो पढाई के बजाय मास्‍टर माइण्‍ड गुरुओं की शरण में पहुंच गये। पढ़ाई के दौरान ये किशोर अपनी गतिविधियों को अंजाम देते रहे। शहर में वाहन चोरी और चोरी की वारदातों को अंजाम देने वाला यह गिरोह पुलिस के हाथ लगा तो हर कोई भौचक रह गया। पूर्व मंत्री के घर हुई लाखों की चोरी में उन्‍हीं के नाती का हाथ होने के खुलासा हुआ तो यह सवाल भी उपजे कि आखिर हमारा समाज कहां जा रहा जिसे बच्‍चे का भविष्‍य संवारने के लिए सुविधा दी वही आस्‍तीन का सांप निकला। इतना ही नहीं उसने चोरी की वारदात को इतने योजनाबद्व ढंग से अंजाम दिया कि बड़े-बड़े मास्‍टर माइण्‍ड फेल हो जांय। पुलिस ने पूछताछ किया तो किशोर ने यह रहस्‍योदघाटन किया कि उसने घटना को अंजाम देने के लिए टीवी पर आने वाले धारावाहिक सीआईडी से इसकी सीख ली। वह एकमात्र यही सीरियल देखता है। इसी तरह जेब खर्च के लिए दसवीं कक्षा के छात्रों ने वाहन चोरियां करनी शुरू कर दी। पुलिस ने उनके कब्‍जे से चोरी की तीन मोटर साइकिलों को बरामद किया तो उसकी आंखें फटी रह गईं। अब सवाल उठता है कि ऐसे हालात क्‍यों उत्‍पन्‍न हो रहे हैं इस सवाल के जवाब में एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि बच्‍चों को शिक्षा के लिए अच्‍छे स्‍कूलों में दाखिला तो दिला दिया जाता है लेकिन उनकी गतिविधियों पर मां-बाप नजर नहीं रखते। परिवार में आधुनिकता और फैशन का माहौल और गैर जिम्‍मेदाराना रुख बच्‍चों को अपराध की ओर उन्‍मुख कर रहा है।

रविवार, फ़रवरी 28, 2010

आओ दिल से दिल मिलाएं हिन्‍दू-मुस्लिम, सिख, इसाई

आया होली का त्‍योहार लाया रंगों की बौछार, आया होली का त्‍योहार---

संग मिल बैठेंगे चार यार रमू बिरजू, मोलहे, काली

आज खुशी का मौका है भइया हो जाये बोतल खाली

विश्‍वनाथ, करिया और घिसियावन भी ठण्‍डई खूब उडाए

छोट-बड़े सब होलियार बन गये घिस-घिस रंग लगावें

पूड़ी, सोहारी, गुछिया, मालपुआ की जमकर हुई छकाई

रास-रंग की मस्‍ती में कोऊ छोटा न बड़ भाई

अबीर-गुलाल संग गले मिल रहे चाचा, भैया, ताऊ

रंगों के त्‍योहार में सबमें मस्‍ती छायी

यारी का रंग चटख हो गया छोड़ दुश्‍मनी भाई

आओ दिल से दिल मिलाएं हिन्‍दू-मुस्लिम हों या सिख इसाई

आया होली का त्‍योहार लाया रंगों की बौछार

शनिवार, फ़रवरी 27, 2010

बहुत याद आती है बचपन की होली

बहुत याद आती है बचपन की होली।वे अल्‍हड़पन, हंसी-ठिठोली। रंगों की मस्‍ती और शरारत। कैसे भूलेगी बचपन की होली। ग्रामीण परिवेश में पलने-बढ़ने के कारण गांवों में होने वाले त्‍योहारों के बारे में करीबी जानकारी है। मेरे बचपन में होली का उल्‍लास करीब महीने भर पहले शुरू हो जाता था। नतीजतन मार्च के पहले यानि जनवरी, फरवरी में होनी वाली शादियां और गौने में विदाई के वक्‍त रंग पड़ने लगता था। रिश्‍तेदारियों में जाने से पूर्व लोग मानसिक रूप से होली खेलने को तैयार रहते थे। बसंत पंचमी के दिन रेड़ गड़ने के बाद से होलिका की तैयारी शुरू हो जाती थी। इसी शाम कबीर बोलने का सिलसिला चलता था। इसमें अपने रिश्‍तों के हिसाब से खूब गालियों की बौछार होती थी। कभी-कभार इसको लेकर शिकवा-शिकायतें भी होती थीं लेकिन गांव के मानिन्‍द और बुजर्गु त्‍योहार का वास्‍ता देकर बात आगे बढ़ने के बजाय पटाक्षेप कर देते थे। होली के पखवारे भर पूर्व गांवों में कनई फेंकने (गीली मिटटी ) का चलन था। पड़ोसी गांवों से इस बात को लेकर होड़ लग जाती थी कि इस बार किसकी होलिका कितनी ऊंची होगी और ज्‍यादा देर तक किसकी होलिका जलेगी। इसी के मददेनजर होलिका दहन की पूर्व संध्‍या पर युवा टोली गांव में घर-घर घूमकर लकडी और उपले इकटठा करती थी। इसके बाद भी कसर दिखने पर देर शाम शुरू होता था लकड़ी चुराने और खेतों में रखे छप्‍पर उठाने का सिलसिला। नलकूपों पर छांव के लिए रखे जिन छप्‍परों की रखवाली नहीं होती थी वह तो रात में गायब हो जाता था। कभी-कभी इसकी भरपाई भी युवकों के परिवारीजनों को करनी पड़ती थी। गांवों में आज के डेढ़-दो दशक पूर्व एका और भाईचारा की इससे बढि़या मिसाल कुछ हो ही नहीं सकता। आज का दौर होता तो गांवों के कितने युवकों के विरुद्ध आगजनी और चोरी का मुकदमा कायम हो जाता। होली के दिन तो कुछ कहना ही नहीं था। सुबह से की बच्‍चों की टोली रंग लेकर घर-घर धावा बोलने लगती। चाची, काकी, बुआ और भाभी होलियारों के निशाने पर होतीं। रंग डालने के चक्‍कर में कितनों के पकवान खराब हो जाते और कितनों के घरों के कीमती सामान लेकिन होली के नाम पर हर शरारत अनदेखी हो जाती। दूसरी बेला यानि शाम के समय अबीर लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता था। इस दौरान लोग उनके घरों पर भी जाने से गुरेज नहीं करते जिनसे खान-पान और बोली-बानी बंद रहता था। मतलब सारे रंज भुलाकर गले मिलने में कोई दिक्‍कत नहीं होती थी। यह सिलसिला गांवों से दूसरे गांवों और क्षेत्रों तक जारी रहता था। वहीं एक स्‍थल पर बैठकर गंवई टीम फाग और गीत-संगीत से माहौल को और भी रंगीन बना देती थी। गांवों में प्रजा को पकवान और बख्‍शीश देने का चलन भी है जो अब भी बरकरार है। आज की होली पर तमाम प्रतिबंधों की मार है। एक तो महंगाई जेब ढीली कर रही है तो दूसरी ओर बढ़ती कटुता के कारण सगे-सम्‍बन्‍धी भी अपनों से मिलने से कतराते हैं। बच्‍चों की जरा सी शरारत उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का सबब बन सकती है। इसलिए गांवों में त्‍योहारों का रंग अब फीका पड़ने लगा है। रिश्‍तों पर सियासत भारी पड़ रही है। दांव-पेंच के चक्‍कर में सब कुछ उलटा-पुलटा हो गया है।

शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

कितना पीछे है हमारा सुरक्षा तंत्र

39 घण्‍टें की कोशिशों के बाद शमीम तो पुलिस की गिरफ़त में आ गया लेकिन इस दौरान जो कुछ हुआ और दिखा उससे एक बात तो साफ है कि हमारा सुरक्षा तंत्र कितना पीछे है। ऐसे में आतंकी घ्टनाओं को रोकने के दावे और उनसे मुकाबले की बात करना भी बेमानी होगी। दुनाली बंदूक और चंद कारतूसों के दम पर प्रदेश् की राजधानी लखनऊ में पुलिस को सिर के बल खड़ा रहने को शमीम ने विवश कर दिया। इस घटना में पुलिसजनों का धैर्य और उनकी कार्रवाई वाकई काबिले तारीफ है लेकिन नौसिखिए और अप्रशिक्षित युवक के विरुद्व आपरेशन में इतना वक्‍त लगना गंभीर चिंतनीय है। सुरक्षा एजेंसियों को इस बारे में चिंतन करना चाहिए। इसकी समीक्षा शासन स्‍तर पर भी होना जरूरी है। सुरक्षा व्‍यवस्‍था को लेकर जिस तरह की संजीदगी होनी चाहिए वह वास्‍तव में नहीं है। हर जिले में नहीं लेकिन राजधानी और मण्‍डल मुख्‍यालयों पर ऐसा सुरक्षा दस्‍ता होना चाहिए जो चंद पलों में किसी भी हालात से निपटने में दक्ष हो। उसे कमाण्‍डों स्‍तर का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। प्रदेश्‍ा सरकार को चाहिए कि वह जिला मुख्‍यालयों पर भी त्‍वरित कार्रवाई के लिए क्‍यूआरटी का गठन करे जिसमें ऐसे पुलिसकर्मी रखे जाएं जो वाकई में जांबाज हों और उन्‍हें साधन संसाधन भी मुहैया कराया जाना चाहिए। अयोध्‍या, मथुरा, काशी और ताजमहल जैसे अति महत्‍वपूर्ण स्‍थलों की सुरक्षा के लिए किसी भी हालात से निपटने के लिए कमाण्‍डों दस्‍ता तैनात कियख जाना भी जरूरी है। जिस तरह से खुफियख सूचनाएं आ रही हैं, ऐसे में समय में यह बहुत ही आवश्‍यक है। यह बात शासन के उच्‍चाधिकारियों व खुद सीएम को समझना होगा।